Sunday, 27 November 2022
चचा का दुआर और अपना इलाहाबाद
जिस दिन अपना शहर छोड़ कर निकले थे एक ऐसे अंजान शहर की ओर जिसका अपना इतिहास इतना विशाल था की वहां रह कर पढ़ना सौभाग्य की बात थी। पर था तो वो अंजान शहर ही, वहा के माहौल वहा के लोग उनकी भाषा व्यवहार सब से हम अपरिचित थे। मैं, हम का प्रयोग इसलिए कर रहा हूं क्योंकि हमारे बिहार में हम कह कर ही लोगों को संबोधित करते है अपना भाव लगता है जी बाकी आप हम बोलिए आप आधा बिहारी तो हो ही जाएंगे। तो चलते है विषय की ओर, इलाहाबाद , जी ऐसा शहर जहां हम जब पहुंचे तो इसका इतिहास का जानकारी ले चुके थे। साहित्यिक रंग राजनीतिक पृष्ठभूमि और धार्मिक महत्व सब की जानकारी अपने दिमाग के उस पुर्जे में लगभग भर चुके थे ताकि अपने शैक्षणिक शहर के बारे में जानकारी मिल सके। बाकी जब हम इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पहुंचे तो मानों ऐसा लगा की ये मेरे लिए कोई अंजान शहर लग ही नहीं रहा था। अपने जैसे लोग मिलते जा रहे थे अपनी भाषा वहां की भाषा के लगभग एक जैसी ही थी। लोगो में अपनापन लग रहा था। लोगों ने मानों यहां पर हर बाहरी लोगों को जैसे अपनापन वाला एहसास करा दिया था की आप भले अपने शहर से कोसों दूर आए हो पर ये इलाहाबाद है यहां आने वाला हर विद्यार्थी इलाहाबादी जरूर हो जाता है। बाकी चलते है असल विषय के तरफ़ , जब शहर आए तो सबसे पहले मोबाइल पर आनंद भवन के बारे में देखे और पता चला की ई तो बहुते बड़ा राजनीतिक जगह रहा है। नेहरू का आवास होना इंदिरा गांधी का बचपन बितना अपने आप में बड़ी बात थी। अब इतने बड़े शहर में रूम ढूंढना सबसे बड़ी चुनौती थी मगर शायद ये भी इलाहाबाद का कमाल है की यहां सब आसानी से हो जाता है। रूम भी मिला और जिस आनंद भवन का चर्चा किया था जिसका शीर्षक ऊपर में चचा का दुआर लिखे है उसी के नजदीक मिल गया। अपने दोस्त मिले जो दोस्त कम मेरे भाई जैसे थे। कभी सोचे भी नहीं होंगे की जिस भवन का इतिहास इतना विशाल है वहा पर चाय की चुस्की लेते हुए हम अपने भाइयों के साथ कभी अपने सुख दुख की बाते एक दूसरे से करेंगे। नेहरू चचा के दुआर पर बैठ कर आने वाली राजनीति चुनौतियों पर चर्चा करेंगे? बाकी ठहरे मीडिया के विद्यार्थी तो बात चीत में तो महारत तो थोड़ा बहुत हो ही गया होगा। सोचने लगे एक दिन की दुनिया कितनी छोटी है न जिस शहर के मुख्य पर्यटक स्थल के बारे में जानकारी लेने को उतावला रहते थे आज हम चाय के साथ शाम में अपने अपने सपनो और देश के भविष्य पर उन्हीं जगहों पर बैठे रहते है। गर्मी की वो शाम जहां कभी देश की राजनीतिक बागडोर संभालने वाली इंदिरा गांधी का बचपन बीता होगा। ये शहर सचमुच अदभुत सा लगा अपनापन सा लगा यहां के चाय उन चाय के साथ लोगो की राय कहीं अवधि,भोजपुरी तो कहीं मैथिली भाषा का रस जो किसी संगम की पवित्रता से कहीं कम नहीं था। विचार तो मानों यहां समुद्र की लहरों के सामान प्रवाहित होते हो। अब अंत करते हुए दुआर का अर्थ समझा देता हूं की दुआर असल में गांव की उस जगह को कहते है जहा से घर की शुरुआत होती है बाहरी हिस्सा। बाकी आप सब तो समझदार है ही बस अपना ये एक तरह से एक छोटा सा प्रयास था की अपने एहसासों को शब्दों के जरिए लिख सकूं बाकी लिखने का अभ्यास भी होगा मेरा।
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